श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

बन्धुर्वधार्हदोषोऽपि न बन्धोर्वधमर्हति।

त्याज्यः स्वेनैव दोषेण हतः किं हन्यते पुनः॥ ३९

bandhurvadhārhadoṣo'pi na bandhorvadhamarhati|

tyājyaḥ svenaiva doṣeṇa hataḥ kiṃ hanyate punaḥ|| 39

अर्थ

अब श्रीकृष्णसे बोले—‘कृष्ण! यदि अपना सगा-सम्बन्धी वध करनेयोग्य अपराध करे तो भी अपने ही सम्बन्धियोंके द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है। उसे छोड़ देना चाहिये। वह तो अपने अपराधसे ही मर चुका है, मरे हुएको फिर क्या मारना?’॥ ३९॥

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