॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.54.41
राज्यस्य भूमेर्वित्तस्य स्त्रियो मानस्य तेजसः।
मानिनोऽन्यस्य वा हेतोः श्रीमदान्धाः क्षिपन्ति हि॥ ४१
rājyasya bhūmervittasya striyo mānasya tejasaḥ|
mānino'nyasya vā hetoḥ śrīmadāndhāḥ kṣipanti hi|| 41
अर्थ
इसके बाद श्रीकृष्णसे बोले—‘भाई कृष्ण! यह ठीक है कि जो लोग धनके नशेमें अंधे हो रहे हैं और अभिमानी हैं, वे राज्य, पृथ्वी, पैसा, स्त्री, मान, तेज अथवा किसी और कारणसे अपने बन्धुओंका भी तिरस्कार कर दिया करते हैं’॥ ४१॥