देवि! जो लोग भगवान्की मायासे मोहित होकर देहको ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हींको ऐसा आत्ममोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है॥ ४३॥✎ 891
आत्ममोहो नृणामेष कल्प्यते देवमायया।
सुहृद् दुर्हृदुदासीन इति देहात्ममानिनाम्॥ ४३
देवि! जो लोग भगवान्की मायासे मोहित होकर देहको ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हींको ऐसा आत्ममोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 478) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)