श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

देह आद्यन्तवानेष द्रव्यप्राणगुणात्मकः।

आत्मन्यविद्यया क्लृप्तः संसारयति देहिनम्॥ ४५

deha ādyantavāneṣa dravyaprāṇaguṇātmakaḥ|

ātmanyavidyayā klṛptaḥ saṃsārayati dehinam|| 45

अर्थ

यह शरीर आदि और अन्तवाला है। पञ्चभूत, पञ्चप्राण, तन्मात्रा और त्रिगुण ही इसका स्वरूप है। आत्मामें उसके अज्ञानसे ही इसकी कल्पना हुई है और वह कल्पित शरीर ही, जो उसे ‘मैं समझता है’, उसको जन्म-मृत्युके चक्करमें ले जाता है॥ ४५॥✎ 891

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #891 शब्दोंके बीचका स्थान: होतेहैं। → होते हैं।

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