यह शम्बरासुर सैकड़ों प्रकारकी माया जानता है। इसको अपने वशमें कर लेना या जीत लेना बहुत ही कठिन है। आप अपने इस शत्रुको मोहन आदि मायाओंके द्वारा नष्ट कर डालिये॥ १४॥
तमिमं जहि दुर्धर्षं दुर्जयं शत्रुमात्मनः।
मायाशतविदं त्वं च मायाभिर्मोहनादिभिः॥ १४
यह शम्बरासुर सैकड़ों प्रकारकी माया जानता है। इसको अपने वशमें कर लेना या जीत लेना बहुत ही कठिन है। आप अपने इस शत्रुको मोहन आदि मायाओंके द्वारा नष्ट कर डालिये॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 482) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/55/14/