amuṣmin prītiradhikā vāmaḥ sphurati me bhujaḥ|| 34
अर्थ
हो-न-हो यह वही बालक है, जिसे मैंने अपने गर्भमें धारण किया था; क्योंकि स्वभावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमड़ रहा है और मेरी बायीं बाँह भी फड़क रही है’॥ ३४॥
स एव वा भवेन्नूनं यो मे गर्भे धृतोऽर्भकः।
अमुष्मिन् प्रीतिरधिका वामः स्फुरति मे भुजः॥ ३४
हो-न-हो यह वही बालक है, जिसे मैंने अपने गर्भमें धारण किया था; क्योंकि स्वभावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमड़ रहा है और मेरी बायीं बाँह भी फड़क रही है’॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 485) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/34/