श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

स एव वा भवेन्‍नूनं यो मे गर्भे धृतोऽर्भकः।

अमुष्मिन् प्रीतिरधिका वामः स्फुरति मे भुजः॥ ३४

sa eva vā bhavennūnaṃ yo me garbhe dhṛto'rbhakaḥ|

amuṣmin prītiradhikā vāmaḥ sphurati me bhujaḥ|| 34

अर्थ

हो-न-हो यह वही बालक है, जिसे मैंने अपने गर्भमें धारण किया था; क्योंकि स्वभावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमड़ रहा है और मेरी बायीं बाँह भी फड़क रही है’॥ ३४॥

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