श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सोऽनुध्यायंस्तदेवाघं बलवद्विग्रहाकुलः।

कथं मृजाम्यात्मरजः प्रसीदेद् वाच्युतः कथम्॥ ४०

so'nudhyāyaṃstadevāghaṃ balavadvigrahākulaḥ|

kathaṃ mṛjāmyātmarajaḥ prasīded vācyutaḥ katham|| 40

अर्थ

उसके मनकी आँखोंके सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। बलवान्के साथ विरोध करनेके कारण वह भयभीत भी हो गया था। अब वह यही सोचता रहता कि ‘मैं अपने अपराधका मार्जन कैसे करूँ? मुझपर भगवान् श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्‍न हों॥ ४०॥

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