श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

प्रत्याख्यातः स तेनापि शतधन्वा महामणिम्।

तस्मिन् न्यस्याश्‍वमारुह्य शतयोजनगं ययौ॥ १८

pratyākhyātaḥ sa tenāpi śatadhanvā mahāmaṇim|

tasmin nyasyāśvamāruhya śatayojanagaṃ yayau|| 18

अर्थ

जब इस प्रकार अक्रूरजीने भी उसे कोरा जवाब दे दिया, तब शतधन्वाने स्यमन्तकमणि उन्हींके पास रख दी और आप चार सौ कोस लगातार चलनेवाले घोड़ेपर सवार होकर वहाँसे बड़ी फुर्तीसे भागा॥ १८॥✎ 1692

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1692 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्यमन्तक-मणि → स्यमन्तकमणि

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