श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीष्मं कृपं सविदुरं गान्धारीं द्रोणमेव च।

तुल्यदुःखौ च संगम्य हा कष्टमिति होचतुः॥ २

bhīṣmaṃ kṛpaṃ saviduraṃ gāndhārīṃ droṇameva ca|

tulyaduḥkhau ca saṃgamya hā kaṣṭamiti hocatuḥ|| 2

अर्थ

वहाँ जाकर भीष्मपितामह, कृपाचार्य, विदुर, गान्धारी और द्रोणाचार्यसे मिलकर उनके साथ समवेदना—सहानुभूति प्रकट की और उन लोगोंसे कहने लगे—‘हाय-हाय! यह तो बड़े ही दुःखकी बात हुई’॥ २॥

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