‘चाचाजी! आप दान-धर्मके पालक हैं। हमें यह बात पहलेसे ही मालूम है कि शतधन्वा आपके पास वह स्यमन्तकमणि छोड़ गया है, जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देनेवाली है॥ ३६॥
ननु दानपते न्यस्तस्त्वय्यास्ते शतधन्वना।
स्यमन्तको मणिः श्रीमान् विदितः पूर्वमेव नः॥ ३६
‘चाचाजी! आप दान-धर्मके पालक हैं। हमें यह बात पहलेसे ही मालूम है कि शतधन्वा आपके पास वह स्यमन्तकमणि छोड़ गया है, जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देनेवाली है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.57.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 495) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/57/36/