श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

का त्वं कस्यासि सुश्रोणि कुतोऽसि किं चिकीर्षसि।

मन्ये त्वां पतिमिच्छन्तीं सर्वं कथय शोभने॥ १९

kā tvaṃ kasyāsi suśroṇi kuto'si kiṃ cikīrṣasi|

manye tvāṃ patimicchantīṃ sarvaṃ kathaya śobhane|| 19

अर्थ

‘सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? कहाँसे आयी हो? और क्या करना चाहती हो? मैं ऐसा समझता हूँ कि तुम अपने योग्य पति चाह रही हो। हे कल्याणि! तुम अपनी सारी बात बतलाओ’॥ १९॥

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