श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

नान्यं पतिं वृणे वीर तमृते श्रीनिकेतनम्।

तुष्यतां मे स भगवान् मुकुन्दोऽनाथसंश्रयः॥ २१

nānyaṃ patiṃ vṛṇe vīra tamṛte śrīniketanam|

tuṣyatāṃ me sa bhagavān mukundo'nāthasaṃśrayaḥ|| 21

अर्थ

वीर अर्जुन! मैं लक्ष्मीके परम आश्रय भगवान्‌को छोड़कर और किसीको अपना पति नहीं बना सकती। अनाथोंके एकमात्र सहारे, प्रेम वितरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्‍न हों॥ २१॥

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