श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

न तां शेकुर्नृपा वोढुमजित्वा सप्त गोवृषान्।

तीक्ष्णशृंगान् सुदुर्धर्षान् वीरगन्धासहान् खलान्॥ ३३

na tāṃ śekurnṛpā voḍhumajitvā sapta govṛṣān|

tīkṣṇaśṛṃgān sudurdharṣān vīragandhāsahān khalān|| 33

अर्थ

परीक्षित्! कोसलदेशके राजा थे न‌ग्‍नजित्। वे अत्यन्त धार्मिक थे। उनकी परमसुन्दरी कन्याका नाम था सत्या; न‌ग्‍नजित‍्की पुत्री होनेसे वह ना‌ग्‍नजिती भी कहलाती थी। परीक्षित्! राजाकी प्रतिज्ञाके अनुसार सात दुर्दान्त बैलोंपर विजय प्राप्त न कर सकनेके कारण कोई राजा उस कन्यासे विवाह न कर सके। क्योंकि उनके सींग बड़े तीखे थे और वे बैल किसी वीर पुरुषकी गन्ध भी नहीं सह सकते थे॥ ३२-३३॥✎ 1693

यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1693 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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