परीक्षित्! राजा नग्नजित्ने भगवान् श्रीकृष्णकी विधिपूर्वक अर्चा-पूजा करके यह प्रार्थना की—‘जगत्के एकमात्र स्वामी नारायण! आप अपने स्वरूपभूत आनन्दसे ही परिपूर्ण हैं और मैं हूँ एक तुच्छ मनुष्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’॥ ३८॥✎ 1693
अर्चितं पुनरित्याह नारायण जगत्पते।
आत्मानन्देन पूर्णस्य करवाणि किमल्पकः॥ ३८
परीक्षित्! राजा नग्नजित्ने भगवान् श्रीकृष्णकी विधिपूर्वक अर्चा-पूजा करके यह प्रार्थना की—‘जगत्के एकमात्र स्वामी नारायण! आप अपने स्वरूपभूत आनन्दसे ही परिपूर्ण हैं और मैं हूँ एक तुच्छ मनुष्य! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 501) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/58/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)