श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

पृथां समागत्य कृताभिवादन-

स्तयातिहार्दार्द्रदृशाभिरम्भितः ।

आपृष्टवांस्तां कुशलं सहस्नुषां

पितृष्वसारं परिपृष्टबान्धवः॥ ७

pṛthāṃ samāgatya kṛtābhivādana-

stayātihārdārdradṛśābhirambhitaḥ |

āpṛṣṭavāṃstāṃ kuśalaṃ sahasnuṣāṃ

pitṛṣvasāraṃ paripṛṣṭabāndhavaḥ|| 7

अर्थ

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अपनी फूआ कुन्तीके पास गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया। कुन्तीजीने अत्यन्त स्नेहवश उन्हें अपने हृदयसे लगा लिया। उस समय उनके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये। कुन्तीजीने श्रीकृष्णसे अपने भाई-बन्धुओंकी कुशल-क्षेम पूछी और भगवान्‌ने भी उनका यथोचित उत्तर देकर उनसे उनकी पुत्रवधू द्रौपदी और स्वयं उनका कुशल-मंगल पूछा॥ ७॥

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