श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

आविध्य शूलं तरसा गरुत्मते

निरस्य वक्त्रैर्व्यनदत् स पंचभिः।

स रोदसी सर्वदिशोऽन्तरं महा-

नापूरयन्‍नण्डकटाहमावृणोत् ॥ ८

āvidhya śūlaṃ tarasā garutmate

nirasya vaktrairvyanadat sa paṃcabhiḥ|

sa rodasī sarvadiśo'ntaraṃ mahā-

nāpūrayannaṇḍakaṭāhamāvṛṇot || 8

अर्थ

उसने अपने त्रिशूलको बड़े वेगसे घुमाकर गरुड़जीपर चलाया और फिर अपने पाँचों मुखोंसे घोर सिंहनाद करने लगा। उसके सिंहनादका महान् शब्द पृथ्वी, आकाश, पाताल और दसों दिशाओंमें फैलकर सारे ब्रह्माण्डमें भर गया॥ ८॥

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