श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन समस्त जगत्के परमपिता और ज्ञानदाता भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगपर आरामसे बैठे हुए थे। भीष्मकनन्दिनी श्रीरुक्मिणीजी सखियोंके साथ अपने पतिदेवकी सेवा कर रही थीं, उन्हें पंखा झल रही थीं॥ १॥✎ 143721162117
कर्हिचित् सुखमासीनं स्वतल्पस्थं जगद्गुरुम्।
पतिं पर्यचरद् भैष्मी व्यजनेन सखीजनैः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन समस्त जगत्के परमपिता और ज्ञानदाता भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगपर आरामसे बैठे हुए थे। भीष्मकनन्दिनी श्रीरुक्मिणीजी सखियोंके साथ अपने पतिदेवकी सेवा कर रही थीं, उन्हें पंखा झल रही थीं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 510) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/60/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)