श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके क्षणभरके लिये भी अलग न होनेके कारण रुक्मिणीजीको यह अभिमान हो गया था कि मैं इनकी सबसे अधिक प्यारी हूँ। इसी गर्वकी शान्तिके लिये इतना कहकर भगवान् चुप हो गये॥ २१॥
एतावदुक्त्वा भगवानात्मानं वल्लभामिव।
मन्यमानामविश्लेषात् तद्दर्पघ्न उपारमत्॥ २१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके क्षणभरके लिये भी अलग न होनेके कारण रुक्मिणीजीको यह अभिमान हो गया था कि मैं इनकी सबसे अधिक प्यारी हूँ। इसी गर्वकी शान्तिके लिये इतना कहकर भगवान् चुप हो गये॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 513) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/60/21/