श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णः प्रियायाः प्रेमबन्धनम्।

हास्यप्रौढिमजानन्त्याः करुणः सोऽन्वकम्पत॥ २५

tad dṛṣṭvā bhagavān kṛṣṇaḥ priyāyāḥ premabandhanam|

hāsyaprauḍhimajānantyāḥ karuṇaḥ so'nvakampata|| 25

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मेरी प्रेयसी रुक्मिणीजी हास्य-विनोदकी गम्भीरता नहीं समझ रही हैं और प्रेम-पाशकी दृढ़ताके कारण उनकी यह दशा हो रही है। स्वभावसे ही परम कारुणिक भगवान् श्रीकृष्णका हृदय उनके प्रति करुणासे भर गया॥ २५॥

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