श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

प्रमृज्याश्रुकले नेत्रे स्तनौ चोपहतौ शुचा।

आश्‍लिष्य बाहुना राजन्‍ननन्यविषयां सतीम्॥ २७

pramṛjyāśrukale netre stanau copahatau śucā|

āśliṣya bāhunā rājannananyaviṣayāṃ satīm|| 27

अर्थ

भगवान्‌ने उनके नेत्रोंके आँसू और शोकके आँसुओंसे भींगे हुए स्तनोंको पोंछकर अपने प्रति अनन्य प्रेमभाव रखनेवाली उन सती रुक्मिणीजीको बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया॥ २७॥

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