भगवान्ने उनके नेत्रोंके आँसू और शोकके आँसुओंसे भींगे हुए स्तनोंको पोंछकर अपने प्रति अनन्य प्रेमभाव रखनेवाली उन सती रुक्मिणीजीको बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया॥ २७॥
प्रमृज्याश्रुकले नेत्रे स्तनौ चोपहतौ शुचा।
आश्लिष्य बाहुना राजन्ननन्यविषयां सतीम्॥ २७
भगवान्ने उनके नेत्रोंके आँसू और शोकके आँसुओंसे भींगे हुए स्तनोंको पोंछकर अपने प्रति अनन्य प्रेमभाव रखनेवाली उन सती रुक्मिणीजीको बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 513) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/60/27/