श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

मुखं च प्रेमसंरम्भस्फुरिताधरमीक्षितुम्।

कटाक्षेपारुणापांगं सुन्दरभ्रुकुटीतटम्॥ ३०

mukhaṃ ca premasaṃrambhasphuritādharamīkṣitum|

kaṭākṣepāruṇāpāṃgaṃ sundarabhrukuṭītaṭam|| 30

अर्थ

मैं देखना चाहता था कि मेरे यों कहनेपर तुम्हारे लाल-लाल होठ प्रणय-कोपसे किस प्रकार फड़कने लगते हैं। तुम्हारे कटाक्षपूर्वक देखनेसे नेत्रोंमें कैसी लाली छा जाती है और भौंहें चढ़ जानेके कारण तुम्हारा मुँह कैसा सुन्दर लगता है॥ ३०॥✎ 2119

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2119 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें