उद्यानमें पारिजातके उपवनकी सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द शीतल वायु चल रही थी। झरोखोंकी जालियोंमेंसे अगरके धूपका धूआँ बाहर निकल रहा था॥ ५॥✎ 143721162117
पारिजातवनामोदवायुनोद्यानशालिना ।
धूपैरगुरुजै राजन् जालरन्ध्रविनिर्गतैः॥ ५
उद्यानमें पारिजातके उपवनकी सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द शीतल वायु चल रही थी। झरोखोंकी जालियोंमेंसे अगरके धूपका धूआँ बाहर निकल रहा था॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 510) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)