श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

सोपाच्युतं क्वणयती मणिनूपुराभ्यां

रेजेऽङ्गुलीयवलयव्यजनाग्रहस्ता ।

वस्त्रान्तगूढकुचकुंकुमशोणहार-

भासा नितम्बधृतया च परार्घ्यकाञ्च्या॥ ८

sopācyutaṃ kvaṇayatī maṇinūpurābhyāṃ

reje'ṅgulīyavalayavyajanāgrahastā |

vastrāntagūḍhakucakuṃkumaśoṇahāra-

bhāsā nitambadhṛtayā ca parārghyakāñcyā|| 8

अर्थ

उनके करकमलोंमें जड़ाऊ अँगूठियाँ, कंगन और चँवर शोभा पा रहे थे। चरणोंमें मणिजटित पायजेब रुनझुन-रुनझुन कर रहे थे। अंचलके नीचे छिपे हुए स्तनोंकी केशरकी लालिमासे हार लाल-लाल जान पड़ता था और चमक रहा था। नितम्बभागमें बहुमूल्य करधनीकी लड़ियाँ लटक रही थीं। इस प्रकार वे भगवान्‌के पास ही रहकर उनकी सेवामें संल‌ग्‍न थीं॥ ८॥✎ 1437 2116 2117

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1437 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महक → मँहक
  • #2116 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2117 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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