श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

वृतः३ स्वयंवरे साक्षादनंगोऽङ्गयुतस्तया।

राज्ञः समेतान् निर्जित्य जहारैकरथो युधि॥ २२

vṛtaḥ svayaṃvare sākṣādanaṃgo'ṅgayutastayā|

rājñaḥ sametān nirjitya jahāraikaratho yudhi|| 22

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! प्रद्युम्‍नजी मूर्तिमान् कामदेव थे। उनके सौन्दर्य और गुणोंपर रीझकर रुक्मवतीने स्वयंवरमें उन्हींको वरमाला पहना दी। प्रद्युम्‍नजीने युद्धमें अकेले ही वहाँ इकट्ठे हुए नरपतियोंको जीत लिया और रुक्मवतीको हर लाये॥ २२॥✎ 1695

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्राचीन प्रतिमें ‘वृतः स्वयंवरे..........रथो युधि’ यह श्‍लोक ‘यद्यप्यनुस्मरन्...’ इस तेईसवें श्‍लोकके बाद है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 522)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1695 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नर-पतियोंको → नरपतियोंको

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