परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचकर कि बलरामजीका समर्थन करनेसे रुक्मिणीजी अप्रसन्न होंगी और रुक्मीके वधको बुरा बतलानेसे बलरामजी रुष्ट होंगे, अपने साले रुक्मीकी मृत्युपर भला-बुरा कुछ भी न कहा॥ ३९॥✎ 1696
निहते रुक्मिणि श्याले नाब्रवीत् साध्वसाधु वा।
रुक्मिणीबलयो राजन् स्नेहभंगभयाद्धरिः॥ ३९
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचकर कि बलरामजीका समर्थन करनेसे रुक्मिणीजी अप्रसन्न होंगी और रुक्मीके वधको बुरा बतलानेसे बलरामजी रुष्ट होंगे, अपने साले रुक्मीकी मृत्युपर भला-बुरा कुछ भी न कहा॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 524) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/61/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)