॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.61.5
इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता
ब्रह्मादयोऽपि न विदुः पदवीं यदीयाम्।
भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-
हासावलोकनवसंगमलालसाद्यम् ॥ ५
itthaṃ ramāpatimavāpya patiṃ striyastā
brahmādayo'pi na viduḥ padavīṃ yadīyām|
bhejurmudāviratamedhitayānurāga-
hāsāvalokanavasaṃgamalālasādyam || 5
अर्थ
परीक्षित्! ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता भी भगवान्के वास्तविक स्वरूपको या उनकी प्राप्तिके मार्गको नहीं जानते। उन्हीं रमारमण भगवान् श्रीकृष्णको उन स्त्रियोंने पतिके रूपमें प्राप्त किया था। अब नित्य-निरन्तर उनके प्रेम और आनन्दकी अभिवृद्धि होती रहती थी और वे प्रेमभरी मुसकराहट, मधुर चितवन, नवसमागमकी लालसा आदिसे भगवान्की सेवा करती रहती थीं॥ ५॥