कन्याया दूषणं पुम्भिर्दुष्प्रेक्षाया न विद्महे॥ २९
anapāyibhirasmābhirguptāyāśca gṛhe prabho|
kanyāyā dūṣaṇaṃ pumbhirduṣprekṣāyā na vidmahe|| 29
अर्थ
प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि हमलोग बिना क्रम टूटे, रात-दिन महलका पहरा देते रहते हैं। आपकी कन्याको बाहरके मनुष्य देख भी नहीं सकते। फिर भी वह कलंकित कैसे हो गयी? इसका कारण हमारी समझमें नहीं आ रहा है’॥ २९॥
अनपायिभिरस्माभिर्गुप्तायाश्च गृहे प्रभो।
कन्याया दूषणं पुम्भिर्दुष्प्रेक्षाया न विद्महे॥ २९
प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि हमलोग बिना क्रम टूटे, रात-दिन महलका पहरा देते रहते हैं। आपकी कन्याको बाहरके मनुष्य देख भी नहीं सकते। फिर भी वह कलंकित कैसे हो गयी? इसका कारण हमारी समझमें नहीं आ रहा है’॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.62.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 529) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/62/29/