परीक्षित्! रणोन्मत्त बाणासुरने अपने एक हजार हाथोंसे एक साथ ही पाँच सौ धनुष खींचकर एक-एकपर दो-दो बाण चढ़ाये॥ १८॥✎ 2123
धनूंष्याकृष्य युगपद् बाणः पंचशतानि वै।
एकैकस्मिञ्छरौ द्वौ द्वौ सन्दधे रणदुर्मदः॥ १८
परीक्षित्! रणोन्मत्त बाणासुरने अपने एक हजार हाथोंसे एक साथ ही पाँच सौ धनुष खींचकर एक-एकपर दो-दो बाण चढ़ाये॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.63.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 532) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/63/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)