अखण्ड ज्योतिःस्वरूप परमात्मन्! आपका यह अवतार धर्मकी रक्षा और संसारके अभ्युदय—अभिवृद्धिके लिये हुआ है। हम सब भी आपके प्रभावसे ही प्रभावान्वित होकर सातों भुवनोंका पालन करते हैं॥ ३७॥
तवावतारोऽयमकुण्ठधामन्
धर्मस्य गुप्त्यै जगतो भवाय।
वयं च सर्वे भवतानुभाविता
विभावयामो भुवनानि सप्त॥ ३७
अखण्ड ज्योतिःस्वरूप परमात्मन्! आपका यह अवतार धर्मकी रक्षा और संसारके अभ्युदय—अभिवृद्धिके लिये हुआ है। हम सब भी आपके प्रभावसे ही प्रभावान्वित होकर सातों भुवनोंका पालन करते हैं॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.63.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 534) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/63/37/