॥ श्रीहरिः ॥
यन्मायामोहितधियः पुत्रदारगृहादिषु।
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे॥ ४०
yanmāyāmohitadhiyaḥ putradāragṛhādiṣu|
unmajjanti nimajjanti prasaktā vṛjinārṇave|| 40
अर्थ
भगवन्! आपकी मायासे मोहित होकर लोग स्त्री-पुत्र, देह-गेह आदिमें आसक्त हो जाते हैं और फिर दुःखके अपार सागरमें डूबने-उतराने लगते हैं॥ ४०॥
यन्मायामोहितधियः पुत्रदारगृहादिषु।
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे॥ ४०
भगवन्! आपकी मायासे मोहित होकर लोग स्त्री-पुत्र, देह-गेह आदिमें आसक्त हो जाते हैं और फिर दुःखके अपार सागरमें डूबने-उतराने लगते हैं॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.63.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 534) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/63/40/