वे दोनों ब्राह्मण आपसमें झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करनेके लिये मेरे पास आये। एकने कहा—‘यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है’ और दूसरेने कहा कि ‘यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।’ भगवन्! उन दोनों ब्राह्मणोंकी बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया॥ १८॥
विप्रौ विवदमानौ मामूचतुः स्वार्थसाधकौ।
भवान् दातापहर्तेति तच्छ्रुत्वा मेऽभवद् भ्रमः॥ १८
वे दोनों ब्राह्मण आपसमें झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करनेके लिये मेरे पास आये। एकने कहा—‘यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है’ और दूसरेने कहा कि ‘यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।’ भगवन्! उन दोनों ब्राह्मणोंकी बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/18/