श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

भवन्तावनुगृह्णीतां किंकरस्याविजानतः।

समुद्धरत मां कृच्छ्रात् पतन्तं निरयेऽशुचौ॥ २०

bhavantāvanugṛhṇītāṃ kiṃkarasyāvijānataḥ|

samuddharata māṃ kṛcchrāt patantaṃ niraye'śucau|| 20

अर्थ

मैं आपलोगोंका सेवक हूँ। मुझसे अनजानमें यह अपराध बन गया है। मुझपर आपलोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्टसे तथा घोर नरकमें गिरनेसे बचा लीजिये’॥ २०॥

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