prasahya tu balād bhuktaṃ daśa pūrvān daśāparān|| 35
अर्थ
ब्राह्मणका धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय तब तो वह भोगनेवाले, उसके लड़के और पौत्र—इन तीन पीढ़ियोंको ही चौपट करता है। परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषोंकी दस पीढ़ियाँ और आगेकी भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं॥ ३५॥✎ 1698212421252126
ब्रह्मस्वं दुरनुज्ञातं भुक्तं हन्ति त्रिपूरुषम्।
प्रसह्य तु बलाद् भुक्तं दश पूर्वान् दशापरान्॥ ३५
ब्राह्मणका धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय तब तो वह भोगनेवाले, उसके लड़के और पौत्र—इन तीन पीढ़ियोंको ही चौपट करता है। परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषोंकी दस पीढ़ियाँ और आगेकी भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 540) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/64/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)