जिन उदारहृदय और बहुकुटुम्बी ब्राह्मणोंकी वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोनेपर उनके आँसूकी बूँदोंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने वर्षोंतक ब्राह्मणके स्वत्वको छीननेवाले उस उच्छृंखल राजा और उसके वंशजोंको कुम्भीपाक नरकमें दुःख भोगना पड़ता है॥ ३७-३८॥✎ 1698212421252126
यह अर्थ श्लोक 37–38 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
राजानो राजकुल्याश्च तावतोऽब्दान्निरंकुशाः।
कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते ब्रह्मदायापहारिणः॥ ३८
जिन उदारहृदय और बहुकुटुम्बी ब्राह्मणोंकी वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोनेपर उनके आँसूकी बूँदोंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने वर्षोंतक ब्राह्मणके स्वत्वको छीननेवाले उस उच्छृंखल राजा और उसके वंशजोंको कुम्भीपाक नरकमें दुःख भोगना पड़ता है॥ ३७-३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 541) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/64/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)