श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

एवं निर्भर्त्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम्।

उवाच चकिता वाचं पतिता पादयोर्नृप॥ २५

evaṃ nirbhartsitā bhītā yamunā yadunandanam|

uvāca cakitā vācaṃ patitā pādayornṛpa|| 25

अर्थ

जब बलरामजीने यमुनाजीको इस प्रकार डाँटा-फटकारा, तब वे चकित और भयभीत होकर बलरामजीके चरणोंपर गिर पड़ीं और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगीं—॥ २५॥

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