भगवन्! आप परम ऐश्वर्यशाली हैं। आपके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण ही मुझसे यह अपराध बन गया है। सर्वस्वरूप भक्तवत्सल! मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिये, मुझे छोड़ दीजिये’॥ २७॥
परं भावं भगवतो भगवन् मामजानतीम्।
मोक्तुमर्हसि विश्वात्मन् प्रपन्नां भक्तवत्सल॥ २७
भगवन्! आप परम ऐश्वर्यशाली हैं। आपके वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण ही मुझसे यह अपराध बन गया है। सर्वस्वरूप भक्तवत्सल! मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी भूल-चूक क्षमा कीजिये, मुझे छोड़ दीजिये’॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 545) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/65/27/