परीक्षित्! यमुनाजी अब भी बलरामजीके खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो अनन्तशक्ति भगवान् बलरामजीका यश-गान कर रही हों॥ ३१॥
अद्यापि दृश्यते राजन् यमुनाऽऽकृष्टवर्त्मना।
बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्यं सूचयतीव हि॥ ३१
परीक्षित्! यमुनाजी अब भी बलरामजीके खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और वे ऐसी जान पड़ती हैं, मानो अनन्तशक्ति भगवान् बलरामजीका यश-गान कर रही हों॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 545) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/65/31/