मूर्खलोग उसे बहकाया करते थे कि ‘आप ही भगवान् वासुदेव हैं और जगत्की रक्षाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं।’ इसका फल यह हुआ कि वह मूर्ख अपनेको ही भगवान् मान बैठा॥ २॥
त्वं वासुदेवो भगवानवतीर्णो जगत्पतिः।
इति प्रस्तोभितो बालैर्मेन आत्मानमच्युतम्॥ २
मूर्खलोग उसे बहकाया करते थे कि ‘आप ही भगवान् वासुदेव हैं और जगत्की रक्षाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं।’ इसका फल यह हुआ कि वह मूर्ख अपनेको ही भगवान् मान बैठा॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 546) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/2/