तूने झूठ-मूठ मेरा नाम रख लिया है। अतः मूर्ख! अब मैं तुझसे उन नामोंको भी छुड़ाकर रहूँगा। रही तेरे शरणमें आनेकी बात; सो यदि मैं तुझसे युद्ध न कर सकूँगा तो तेरी शरण ग्रहण करूँगा’॥ २०॥
त्याजयिष्येऽभिधानं मे यत्त्वयाज्ञ मृषा धृतम्।
व्रजामि शरणं तेऽद्य यदि नेच्छामि संयुगम्॥ २०
तूने झूठ-मूठ मेरा नाम रख लिया है। अतः मूर्ख! अब मैं तुझसे उन नामोंको भी छुड़ाकर रहूँगा। रही तेरे शरणमें आनेकी बात; सो यदि मैं तुझसे युद्ध न कर सकूँगा तो तेरी शरण ग्रहण करूँगा’॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 548) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/20/