अभिचार पूर्ण होते ही यज्ञकुण्डसे अति भीषण अग्नि मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसके केश और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल-लाल थे। आँखोंसे अंगारे बरस रहे थे॥ ३२॥✎ 8931953
ततोऽग्निरुत्थितः कुण्डान्मूर्तिमानतिभीषणः।
तप्तताम्रशिखाश्मश्रुरंगारोद्गारिलोचनः॥ ३२
अभिचार पूर्ण होते ही यज्ञकुण्डसे अति भीषण अग्नि मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसके केश और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल-लाल थे। आँखोंसे अंगारे बरस रहे थे॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 549) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)