य एतच्छ्रावयेन्मर्त्य उत्तमश्लोकविक्रमम्।
समाहितो वा शृणुयात् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४३
जो मनुष्य पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके इस चरित्रको एकाग्रताके साथ सुनता या सुनाता है, वह सारे पापोंसे छूट जाता है॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 550) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/66/43/