वीरशिरोमणि बलरामजी उसकी यह चेष्टा देखकर क्रोधित हो गये। उन्होंने उसपर पत्थरका एक टुकड़ा फेंका। परन्तु द्विविदने उससे अपनेको बचा लिया और झपटकर मधुकलश उठा लिया तथा बलरामजीकी अवहेलना करने लगा। उस धूर्तने मधुकलशको तो फोड़ ही डाला, स्त्रियोंके वस्त्र भी फाड़ डाले और अब वह दुष्ट हँस-हँसकर बलरामजीको क्रोधित करने लगा॥ १४-१५॥
यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
तं ग्राव्णा प्राहरत् क्रुद्धो बलः प्रहरतां वरः।
स वञ्चयित्वा ग्रावाणं मदिराकलशं कपिः॥ १४
वीरशिरोमणि बलरामजी उसकी यह चेष्टा देखकर क्रोधित हो गये। उन्होंने उसपर पत्थरका एक टुकड़ा फेंका। परन्तु द्विविदने उससे अपनेको बचा लिया और झपटकर मधुकलश उठा लिया तथा बलरामजीकी अवहेलना करने लगा। उस धूर्तने मधुकलशको तो फोड़ ही डाला, स्त्रियोंके वस्त्र भी फाड़ डाले और अब वह दुष्ट हँस-हँसकर बलरामजीको क्रोधित करने लगा॥ १४-१५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 552) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/67/14/