कभी वह बड़े-बड़े पहाड़ोंको उखाड़कर उनसे प्रान्त-के-प्रान्त चकनाचूर कर देता और विशेष करके ऐसा काम वह आनर्त (काठियावाड़) देशमें ही करता था। क्योंकि उसके मित्रको मारनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी देशमें निवास करते थे॥ ४॥
क्वचित् स शैलानुत्पाट्य तैर्देशान् समचूर्णयत्।
आनर्तान् सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरिः॥ ४
कभी वह बड़े-बड़े पहाड़ोंको उखाड़कर उनसे प्रान्त-के-प्रान्त चकनाचूर कर देता और विशेष करके ऐसा काम वह आनर्त (काठियावाड़) देशमें ही करता था। क्योंकि उसके मित्रको मारनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी देशमें निवास करते थे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 551) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/67/4/