जैसे भृंगी नामका कीड़ा दूसरे कीड़ोंको ले जाकर अपने बिलमें बंद कर देता है, वैसे ही वह मदोन्मत्त वानर स्त्रियों और पुरुषोंको ले जाकर पहाड़ोंकी घाटियों तथा गुफाओंमें डाल देता। फिर बाहरसे बड़ी-बड़ी चट्टानें रखकर उनका मुँह बंद कर देता॥ ७॥
पुरुषान् योषितो दृप्तः क्ष्माभृद्द्रोणीगुहासु सः।
निक्षिप्य चाप्यधाच्छैलैः पेशस्कारीव कीटकम्॥ ७
जैसे भृंगी नामका कीड़ा दूसरे कीड़ोंको ले जाकर अपने बिलमें बंद कर देता है, वैसे ही वह मदोन्मत्त वानर स्त्रियों और पुरुषोंको ले जाकर पहाड़ोंकी घाटियों तथा गुफाओंमें डाल देता। फिर बाहरसे बड़ी-बड़ी चट्टानें रखकर उनका मुँह बंद कर देता॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 551) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/67/7/