परीक्षित्! बलरामजीकी वाणी वीरता, शूरता और बल-पौरुषके उत्कर्षसे परिपूर्ण और उनकी शक्तिके अनुरूप थी। यह बात सुनकर कुरुवंशी क्रोधसे तिलमिला उठे। वे कहने लगे—॥ २३॥✎ 1703
वीर्यशौर्यबलोन्नद्धमात्मशक्तिसमं वचः।
कुरवो बलदेवस्य निशम्योचुः प्रकोपिताः॥ २३
परीक्षित्! बलरामजीकी वाणी वीरता, शूरता और बल-पौरुषके उत्कर्षसे परिपूर्ण और उनकी शक्तिके अनुरूप थी। यह बात सुनकर कुरुवंशी क्रोधसे तिलमिला उठे। वे कहने लगे—॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 556) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)