श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

अलं यदूनां नरदेवलाञ्छनै-

र्दातुः प्रतीपैः फणिनामिवामृतम्।

येऽस्मत्प्रसादोपचिता हि यादवा

आज्ञापयन्त्यद्य गतत्रपा बत॥ २७

alaṃ yadūnāṃ naradevalāñchanai-

rdātuḥ pratīpaiḥ phaṇināmivāmṛtam|

ye'smatprasādopacitā hi yādavā

ājñāpayantyadya gatatrapā bata|| 27

अर्थ

बस-बस, अब हो चुका। यदुवंशियोंके पास अब राजचिह्न रहनेकी आवश्यकता नहीं, उन्हें उनसे छीन लेना चाहिये। जैसे साँपको दूध पिलाना पिलानेवालेके लिये ही घातक है, वैसे ही हमारे दिये हुए राजचिह्नोंको लेकर ये यदुवंशी हमसे ही विपरीत हो रहे हैं। देखो तो भला हमारे ही कृपा-प्रसादसे तो इनकी बढ़ती हुई और अब ये निर्लज्ज होकर हमींपर हुकुम चलाने चले हैं। शोक है! शोक है!॥ २७॥✎ 1703

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1703 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तिल-मिला → तिलमिला

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