ye'smatprasādopacitāṃ dattāṃ no bhuṃjate mahīm|| 3
अर्थ
अतः इस ढीठको पकड़कर बाँध लो। यदि यदुवंशीलोग रुष्ट भी होंगे तो वे हमारा क्या बिगाड़ लेंगे? वे लोग हमारी ही कृपासे हमारी ही दी हुई धन-धान्यसे परिपूर्ण पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं॥ ३॥✎ 1701
बध्नीतेमं दुर्विनीतं किं करिष्यन्ति वृष्णयः।
येऽस्मत्प्रसादोपचितां दत्तां नो भुंजते महीम्॥ ३
अतः इस ढीठको पकड़कर बाँध लो। यदि यदुवंशीलोग रुष्ट भी होंगे तो वे हमारा क्या बिगाड़ लेंगे? वे लोग हमारी ही कृपासे हमारी ही दी हुई धन-धान्यसे परिपूर्ण पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 554) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)