श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

हसन्तं हास्यकथया कदाचित् प्रियया गृहे।

क्वापि धर्मं सेवमानमर्थकामौ च कुत्रचित्॥ २९

hasantaṃ hāsyakathayā kadācit priyayā gṛhe|

kvāpi dharmaṃ sevamānamarthakāmau ca kutracit|| 29

अर्थ

कहीं किसी पत्‍नीके महलमें अपनी प्राणप्रियाके साथ हास्य-विनोदकी बातें करके हँस रहे हैं। तो कहीं धर्मका सेवन कर रहे हैं। कहीं अर्थका सेवन कर रहे हैं—धन-संग्रह और धनवृद्धिके कार्यमें लगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थोचित विषयोंका उपभोग कर रहे हैं॥ २९॥✎ 1705

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1705 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-कुण्डोंमें → यज्ञकुण्डोंमें

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