kvāpi dharmaṃ sevamānamarthakāmau ca kutracit|| 29
अर्थ
कहीं किसी पत्नीके महलमें अपनी प्राणप्रियाके साथ हास्य-विनोदकी बातें करके हँस रहे हैं। तो कहीं धर्मका सेवन कर रहे हैं। कहीं अर्थका सेवन कर रहे हैं—धन-संग्रह और धनवृद्धिके कार्यमें लगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थोचित विषयोंका उपभोग कर रहे हैं॥ २९॥✎ 1705
हसन्तं हास्यकथया कदाचित् प्रियया गृहे।
क्वापि धर्मं सेवमानमर्थकामौ च कुत्रचित्॥ २९
कहीं किसी पत्नीके महलमें अपनी प्राणप्रियाके साथ हास्य-विनोदकी बातें करके हँस रहे हैं। तो कहीं धर्मका सेवन कर रहे हैं। कहीं अर्थका सेवन कर रहे हैं—धन-संग्रह और धनवृद्धिके कार्यमें लगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थोचित विषयोंका उपभोग कर रहे हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 564) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/69/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)