॥ श्रीहरिः ॥
यजन्तं सकलान् देवान् क्वापि क्रतुभिरूर्जितैः।
पूर्तयन्तं क्वचिद् धर्मं कूपाराममठादिभिः॥ ३४
yajantaṃ sakalān devān kvāpi kratubhirūrjitaiḥ|
pūrtayantaṃ kvacid dharmaṃ kūpārāmamaṭhādibhiḥ|| 34
अर्थ
कहीं बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा समस्त देवताओंका यजन-पूजन और कहीं कूएँ, बगीचे तथा मठ आदि बनवाकर इष्टापूर्त धर्मका आचरण कर रहे हैं॥ ३४॥
यजन्तं सकलान् देवान् क्वापि क्रतुभिरूर्जितैः।
पूर्तयन्तं क्वचिद् धर्मं कूपाराममठादिभिः॥ ३४
कहीं बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा समस्त देवताओंका यजन-पूजन और कहीं कूएँ, बगीचे तथा मठ आदि बनवाकर इष्टापूर्त धर्मका आचरण कर रहे हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 565) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/34/