॥ श्रीहरिः ॥
तत्रोपमन्त्रिणो राजन् नानाहास्यरसैर्विभुम्।
उपतस्थुर्नटाचार्या नर्तक्यस्ताण्डवैः पृथक्॥ १९
tatropamantriṇo rājan nānāhāsyarasairvibhum|
upatasthurnaṭācāryā nartakyastāṇḍavaiḥ pṛthak|| 19
अर्थ
परीक्षित्! सभामें विदूषकलोग विभिन्न प्रकारके हास्य-विनोदसे, नटाचार्य अभिनयसे और नर्तकियाँ कलापूर्ण नृत्योंसे अलग-अलग अपनी टोलियोंके साथ भगवान्की सेवा करतीं ॥ १९॥
तत्रोपमन्त्रिणो राजन् नानाहास्यरसैर्विभुम्।
उपतस्थुर्नटाचार्या नर्तक्यस्ताण्डवैः पृथक्॥ १९
परीक्षित्! सभामें विदूषकलोग विभिन्न प्रकारके हास्य-विनोदसे, नटाचार्य अभिनयसे और नर्तकियाँ कलापूर्ण नृत्योंसे अलग-अलग अपनी टोलियोंके साथ भगवान्की सेवा करतीं ॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 569) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/70/19/